हिन्दी कविता : Ek Mulaqat : Amrita Pritam : Rasika Duggal in Hindi Studio with Manish Gupta

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129   1 year ago
razazaidi | 0 subscribers
129   1 year ago
एक मुलाक़ात : अमृता प्रीतम मैं चुप शान्त और अडोल खड़ी थीसिर्फ पास बहते समुन्द्र में तूफान था……फिर समुन्द्र को खुदा जानेक्या ख्याल आयाउसने तूफान की एक पोटली सी बांधीमेरे हाथों में थमाईऔर हंस कर कुछ दूर हो गयाहैरान थी….पर उसका चमत्कार ले लियापता था कि इस प्रकार की घटनाकभी सदियों में होती है…..लाखों ख्याल आयेमाथे में झिलमिलायेपर खड़ी रह गयी कि उसको उठा करअब अपने शहर में कैसे जाऊंगी?मेरे शहर की हर गली संकरीमेरे शहर की हर छत नीचीमेरे शहर की हर दीवार चुगलीसोचा कि अगर तू कहीं मिलेतो समुन्द्र की तरहइसे छाती पर रख करहम दो किनारों की तरह हंस सकते थेऔर नीची छतोंऔर संकरी गलियोंके शहर में बस सकते थे….पर सारी दोपहर तुझे ढूंढते बीतीऔर अपनी आग का मैंनेआप ही घूंट पियामैं अकेला किनाराकिनारे को गिरा दियाऔर जब दिन ढलने को थासमुन्द्र का तूफानसमुन्द्र को लौटा दिया….अब रात घिरने लगी तो तूं मिला हैतूं भी उदास, चुप, शान्त और अडोलमैं भी उदास, चुप, शान्त और अडोलसिर्फ- दूर बहते समुन्द्र में तूफान है…..Created by : Manish Gupta (Film.Bombay@gmail.com)© Active Illusions (www.Active-illusions.com)Amrita Pritam (b 1919) wrote only in Punjabi as she could barely read any other language. Sahir once invited her and her much younger partner Imroz to meet him in a hotel room. They ordered whiskey, sat and talked for a long time. At midnight, Amrita received a call from Sahir saying "There are still three glasses lying on the table, and by turn I am sipping from each of them, and writing Mere Saathi Khaali Jaam." She once wrote for Imroz, “I feel that the fourteen years that I spent pining for Sahir’s love were just a prelude to my passion for you….”
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